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मुजफ्फरपुर मे एक अनोखा स्‍कूल यहां 2 शिक्षक 2 रसोइया और पढ़ने वाले स‍िर्फ 5 ,महीने मे खर्च ढ़ाई लाख


मुजफ्फरपुर सकरा में एक ऐसा सरकारी विद्यालय है, जिसे दो शिक्षक, दो रसोइया और पांच विद्यार्थी मिलकर चला रहे हैं। प्रखंड की विशुनपुर बघनगरी पंचायत के वार्ड चार में राजकीय प्राथमिक विद्यालय में इस शैक्षिक वर्ष में महज 12 विद्यार्थी नामांकित हैं। इनमें भी औसतन चार से पांच की ही उपस्थिति दर्ज होती है। ये बच्चे भी विद्यालय के पोषक क्षेत्र से बाहर के हैं। इन्हें पढ़ाने के लिए दो शिक्षकों की तैनाती है। मध्याह्न भोजन बनाने के लिए दो रसोइये भी कार्यरत हैं। 1986 में वार्ड के सूर्यदेव मिश्रा ने विद्यालय की स्थापना के लिए दो कठ्ठा जमीन दान की थी। वर्ष 2003

में भवन तैयार कर पढ़ाई शुरू भी हो गई। तब क्षेत्र के 150 से 200 तक ब'चे पढऩे आते थे, लेकिन 2010 के बाद इनकी संख्या कम होने लगी। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में कमी और अंग्रेजी स्कूलों के बढ़ते प्रभाव के कारण लोगों का इस ओर रुझान कम होने लगा। बीते पांच साल में स्थिति और खराब हो गई। वर्ष 2016 में 31, 2017 में 27, 2018 में 21 और 2019 में 17 विद्यार्थी नामांकित हुए थे। इन वर्षों में उपस्थिति 10-15 से कभी ज्यादा नहीं रही। यहां के पांचवीं तक के 100 से अधिक विद्यार्थी आसपास के आधा दर्जन निजी स्कूलों में पढऩे जाते हैं।

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव बना कारण

गांव के ब'चों को बुनियादी शिक्षा मिल सके, इस सपने के साथ सूर्य देव मिश्रा ने दो कठ्ठा जमीन विद्यालय के नाम कर दिया। स्कूल निर्माण के कुछ वर्ष बाद तक अ'छी-खासी संख्या में ब'चे पढऩे आते रहे। बाद में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अभाव में अभिभावकों का स्कूल से मोह भंग हो गया। आंगनवाड़ी सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार गावं में ब'चों की संख्या अ'छी-खासी है। बावजूद इसके विद्यालय में ब'चों का नामांकन नहीं है। अधिकांश ब'चे शहर में पढ़ाई कर रहे हैं।

अध्यापक नहीं लेते रुचि

वार्ड सदस्य पति रौशन कुमार एवं ग्रामीण रुपेश कुमार, मुन्ना कुमार और संतोष कुमार कहते हैं अध्यापक कभी भी अभिभावकों को ब'चों को विद्यालय भेजने के लिए प्रेरित नहीं करते हैं। शिक्षा विभाग के उ'चाधिकारी भी कम पंजीकरण के लिए अध्यापकों पर कार्रवाई नहीं करते। तीन छात्र कक्षा एक, एक छात्र कक्षा दो, तीन छात्र कक्षा तीन और चार छात्र कक्षा चार व एक छात्रा कक्षा पांच में नामांकित है। शिक्षा मित्र प्रमिता देवी कहती हैं कि ब'चों की संख्या बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं

एक बच्‍चे पर 50 हजार होता खर्च

एक बच्‍चे को कक्षा पहली से पांचवीं तक पढ़ाने में पचास हजार रुपये सरकारी खर्च आता है। इसमें अध्यापक के वेतन के अलावा स्टेशनरी, बिजली व पानी सहित अन्य खर्च अलग से हैं। प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी उत्तम प्रसाद के मुताबिक शिक्षकों को टारगेट दिया गया है। नए सत्र में ब'चो की संख्या में बढ़ोतरी होगी।

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