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बिहार में मेडिकल सिस्टम की लापरवाही की कहानी, प्रसव पीड़िता की जाते-जाते मुश्किल से बची जान


कोरोना के नाम पर इलाज में लापरवाही जानलेवा हो सकती है। ऐसा ही एक मामला मधेपुरा में सामने आया है। बीती रात जिले के घैलाढ़ निवासी टुड्डू कुमार की पत्नी चंदन देवी प्रसव पीड़ा में थी। उसे शाम को घैलाढ़ पीएचसी में भर्ती कराया गया। वहां उसने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया।

इस दौरान चंदन की कोरोना जांच हुई थी, जो निगेटिव थी। लेकिन प्रसव के बाद ब्लीडिंग रुक नहीं रही थी। सारी दिक्कतें यहीं से शुरू हुई।

रात में 3 अस्पतालों मे घूमे परिजन

चंदन देवी को पीएचसी से मधेपुरा सदर अस्पताल रेफर कर दिया गया। रात करीब 10 बजे परिजन मधेपुरा पहुंचे तो यहां इलाज से पहले फिर उसका कोरोना टेस्ट किया गया। इसमें उसे कोरोना पॉजिटिव बता दिया गया।

फिर बिना इलाज ही उसे जन नायक कर्पूरी ठाकुर मेडिकल कालेज अस्पताल भेज दिया गया।

अब रात 12 बजे के करीब परिवार वाले चंदन देवी को मेडिकल कालेज ले गए। वहां फिर कोरोना जांच हुई जिसमें चंदन देवी को निगेटिव बताया गया। वहां तैनात महिला चिकित्सक ने कहा कि उसे खून चढ़ाने की जरूरत है। ब्लड बैंक सदर अस्पताल में है, इसलिए आपको वहां से खून लाना होगा। इस बीच चंदन की स्थिति भी बिगड़ने लगी थी। परिजनों के अनुसार मेडिकल कालेज की डॉक्टर ने ही चंदन देवी को प्राइवेट हॉस्पीटल ले जाने की सलाह दे दी।

परेशान परिजन चंदन देवी को आननफानन में अहले सुबह करीब 4 बजे मधेपुरा स्थित एक स्त्री रोग विशेषज्ञ के निजी क्लिनिक पर लेकर आए। वहां महिला के प्राइवेट पार्ट में तुरंत ही टांके लगाकर ब्लीडिंग को रोका गया।

फिर दवा दी गई, जिसके बाद उसकी स्थिति सामान्य हुई।

समय पर स्टीचिंग ही थी समस्या का समाधान

चौंकाने वाली बात यह रही कि जिस बीमारी के लक्षण को सिर्फ जानकर ब्लीडिंग से पीड़ित महिला को तीन जगहों से रेफर किया गया, वो महिला प्राइवेट हॉस्पीटल में सामान्य इलाज से स्वस्थ है। चंदन की कहानी ने मधेपुरा के सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है। सिर्फ उसकी स्टीचिंग समय पर हुई होती तो चंदन को शायद इस स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता।

इस संबंध में प्रभारी सिविल सर्जन मो अब्दुल सलाम ने कहा कि मामला सिर्फ लापरवाही का नहीं है।

यह मानवता पर भी सवाल खड़ा करता है। कोरोना के नाम पर इमरजेंसी मरीज को इलाज नहीं मिलना दुर्भाग्यपूर्ण है। यदि शिकायत मिलती है तो जांच के बाद कार्रवाई की जाएगी।

बिहार में स्वास्थ्य विभाग की बदहाली जगजाहिर है देशभर में सबसे निचले पायदान पर है जनता को स्वास्थ्य सुविधाएं नाममात्र भी नहीं मिलती इसके पीछे यहां की जनता भी दोषी है जातिगत राजनीति के चक्रव्यूह में फंसकर लोग एक ही सरकार को बारबार मौका देते है बिहार में 16 साल से स्वास्थ्य मंत्रालय भाजपा के पास है सत्तारूढ़ दल भी बदहाली का ठीकरा एक दुसरे पर फोड़ कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला छाड़ लेते है स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे के कार्यशैली पर बारबार उंगली उठती है लेकिन ढ़ाक के वहीं तीन पात कुछ नहीं बदलता जनता को भी अपनी सोंच में दूरदर्शिता लाना जरूरी है बदलाव तभी संभव है।

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